डॉ. एम.एल. जाट ने भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर के दौरे के दौरान अंतर्देशीय मत्स्य पालन में परिवर्तन के लिए रूपांतरणात्मक अनुसंधान का किया आह्वान

डॉ. एम.एल. जाट ने भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर के दौरे के दौरान अंतर्देशीय मत्स्य पालन में परिवर्तन के लिए रूपांतरणात्मक अनुसंधान का किया आह्वान

13 जुलाई, 2023, बैरकपुर

डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप) ने आज भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीआईएफआरआई), बैरकपुर का आधिकारिक दौरा किया और भारत के अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए नवाचार-आधारित, सतत तथा किसान-केन्द्रित अनुसंधान के प्रति भाकृअनुप की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया। 

इस अवसर पर डॉ. डी.के. यादव, उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप, भी उनके साथ उपस्थित रहे।

डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने संस्थान के वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ डॉ. जाट का गर्मजोशी से स्वागत किया। दौरे की शुरुआत राष्ट्रव्यापी अभियान "एक पेड़ मां के नाम" के अंतर्गत वृक्षारोपण से हुई, जो पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

सचिव ने संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ संवाद कर चल रहे अनुसंधान, नवाचारों तथा प्रौद्योगिकी विकास की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की। औपचारिक कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् के गायन के साथ हुई।

अपने संबोधन में डॉ. जाट ने भारत के अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टि प्रस्तुत करते हुए रूपांतरणात्मक अनुसंधान, बहुविषयक सहयोग तथा किसान-केंद्रित नवाचारों को भविष्य के वैज्ञानिक प्रयासों का प्रमुख आधार बताया।

उन्होंने कहा कि भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की भूमिका रूपांतरणात्मक अनुसंधान, बहुविषयक सहयोग तथा मछुआरों एवं मत्स्य किसानों की आजीविका में सुधार करने वाले किसान-केंद्रित नवाचारों के माध्यम से अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र में परिवर्तन लाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।"

डॉ. जाट ने वैज्ञानिकों से प्रयोगशाला में विकसित खोजों को बड़े पैमाने पर क्षेत्र स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों में परिवर्तित करने पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया। उन्होंने शोधकर्ताओं से संस्थागत सीमाओं से बाहर निकलकर बहुविषयक दृष्टिकोण अपनाने तथा ऐसी प्रौद्योगिकियां विकसित करने का आह्वान किया, जो किसानों और मछुआरों की उभरती चुनौतियों का प्रत्यक्ष समाधान कर सकें। डिजिटल कृषि के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने डेटा को भविष्य का "नया धन" बताया और कहा कि डेटा-आधारित अनुसंधान तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियां कृषि एवं मत्स्य क्षेत्र के नवाचारों की अगली पीढ़ी को दिशा देंगी। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने, उत्कृष्टता को बढ़ावा देने, संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को सम्मानित करने और अन्य को मार्गदर्शन एवं परामर्श के माध्यम से प्रेरित करने वाले वातावरण के निर्माण के महत्व पर भी बल दिया।

वैज्ञानिक संस्थानों के प्रति भाकृअनुप के निरंतर समर्थन की पुनर्पुष्टि करते हुए डॉ. जाट ने शोधकर्ताओं को उत्कृष्टता, नवाचार तथा सामाजिक प्रभाव की दिशा में उनके प्रयासों के लिए हर संभव प्रोत्साहन का आश्वासन दिया।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. यादव ने कहा कि वैज्ञानिक उत्कृष्टता का अंतिम उद्देश्य किसानों और मछुआरों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना होना चाहिए। उन्होंने अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान में भाकृअनुप-सीआईएफआरआई के अग्रणी योगदान की सराहना की तथा विश्वास व्यक्त किया कि संस्थान भारत की ब्लू इकोनॉमी और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाली नवाचारी, सतत एवं हितधारक-केंद्रित प्रौद्योगिकियों का विकास निरंतर करता रहेगा।

कार्यक्रम की शुरुआत में गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. डे ने भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की प्रमुख वैज्ञानिक उपलब्धियों, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों तथा भविष्य की अनुसंधान प्राथमिकताओं की जानकारी दी। उन्होंने विज्ञान-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से उत्पादकता, स्थिरता तथा मछुआरों की आजीविका में सुधार करते हुए भारत के अंतर्देशीय मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के दौरान संस्थान द्वारा डॉ. जाट को उनके दूरदर्शी नेतृत्व तथा कृषि एवं मत्स्य अनुसंधान के प्रति उनके अटूट समर्थन के सम्मान में अभिनंदित किया गया। उन्होंने मछुआरों, वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों तथा कर्मचारियों के साथ भी संवाद किया और प्रौद्योगिकी प्रसार तथा सतत आजीविका सृजन में तेजी लाने के लिए शोधकर्ताओं, विस्तार एजेंसियों तथा हितधारकों के बीच मजबूत सहयोग को प्रोत्साहित किया।

इस अवसर पर भाकृअनुप-सीआईएफआरआई द्वारा विकसित अनेक वैज्ञानिक प्रकाशनों एवं ज्ञान उत्पादों का भी विमोचन किया गया। इनमें सीआईएफआरआई-क्लीनमीन भी शामिल था, जो खाद्य पौधों के अर्क पर आधारित एक अभिनव जल-विक्षेपणीय फॉर्मूलेशन है, जो 24 घंटे के भीतर कार्प, कैटफिश तथा वायु-श्वासी मछलियों सहित लाल-रक्त वाली खरपतवार मछलियों को चयनात्मक रूप से समाप्त करने में सक्षम है, जबकि झींगा, घोंघे तथा जूप्लवक जैसे श्वेत-रक्त वाले जलीय जीवों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। "फिशरीज मैनेजमेंट स्ट्रेटेजीज फॉर डांडुआबील, असम" शीर्षक पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

दौरे का समापन प्रेरणादायक वातावरण में हुआ, जिसने वैज्ञानिक नवाचार, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व तथा प्रौद्योगिकी-आधारित विकास के माध्यम से सतत अंतर्देशीय मत्स्य पालन को आगे बढ़ाने में आईसीएआर-सीआईएफआरआई की महत्वपूर्ण भूमिका को और अधिक सुदृढ़ किया। इस अवसर पर अनुसंधान-आधारित प्रभावी समाधानों के माध्यम से मछुआरों की आजीविका में सुधार तथा सुदृढ़ एवं सतत ब्लू इकोनॉमी के निर्माण के लिए आईसीएआर के विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने की आईसीएआर की परिकल्पना की भी पुनर्पुष्टि हुई।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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