मध्यप्रदेश के शिवपुर जिले के डंगपुरा गांव के जनजातियों की समृद्धि के लिए समुदाय आधारित सौर लिफ्ट सिंचाई प्रणाली

देश के मध्यप्रदेश प्रांत में आदिवासी जनसंख्या (कुल जनजातीय आबादी का 23%) उच्च अनुपात में रहती है। इस राज्य में गोंड, मारिया, भील, भिलाला, सहरिया और कौल जनजातियां निवास करती हैं। विजयपुर तहसील के चेतीखेरा पंचायत के तहत सहरिया जनजातीय गांव डंगपुरा में 62 सहरिया आदिवासी परिवार हैं जिनकी कुल जनसंख्या 415 है। गांव की कुल 28.8 हेक्टेयर भूमि में से 26 हेक्टेयर में खेती की जाती है। पूरे गांव में सीमांत भूमि धारक निवास करते हैं यहां की स्‍थलाकृति असमान है तथा केवल 8% कृषि भूमि पर छोटे डीजल इंजनों द्वारा सिंचाई की जाती है। सहरिया आदिवासी किसानों की खराब आर्थिक स्थितियों के कारण, डीजल से सिंचाई करना उनके लिए महंगा होता है। इस इलाके में औसत वार्षिक वर्षा 750 मिमी है जो ज्यादातर जुलाई और अगस्त के महीनों में होती है। इस समूचे क्षेत्र की जलवायु भी चरमपंथी है अर्थात् चरम न्यूनतम (20 सेल्सियस) और अधिकतम (490 सेल्सियस) जो सूखे मौसम (मध्य और देर मौसम) में होता है। इस गांव की औसत कृषि उत्पादकता संपूर्ण जिले की औसत का केवल आधा है। गांव के सभी परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं और मामूली वन उत्पादों के संग्रह और बिक्री और बारानी खेती से अपनी आजीविका का निर्वाह करते हैं।  कुल औसत मासिक पारिवारिक आय 1500 से 2000 रूपए के बीच है।

  घरेलू उपयोग, पशु पालन और कृषि कार्यों हेतु पानी की कमी के कारण , जिला प्रशासन द्वारा कुवारी नाले (रिवुलेट) पर एक छोटा स्टॉप बांध बनाया गया था। निम्‍न जल-भंडारण और जल उठाने की प्रणाली (वाटर लिफ्टिंग सिस्‍टम) न होने के कारण यह स्टॉप बांध निष्क्रिय हो गया।   

जनजातीय उप-योजना घटक योजना के तहत आईसीएआर-एआईसीआरपी, सिंचाई जल प्रबंधन, मोरेना और आईसीएआर- भारतीय जल प्रबंधन संस्थान के वैज्ञानिकों ने कृषि आधारित आजीविका में सुधार हेतु गांव में सिंचाई विकास की योजना बनाने के लिए डंगपुरा गांव का दौरा किया।

चूंकि निर्मित स्टॉप बांध, पानी उठाने के लिए ज्यादा पानी नहीं रोक सकता था, इसलिए टीम द्वारा पानी के स्तर को बढ़ाने के लिए स्टॉप बांध की ऊंचाई को 1.5 मीटर तक बढ़ाने का प्रस्‍ताव किया गया।  टीएसपी घटक योजना के तहत खेती वाली भूमि की सिंचाई के लिए एक समुदायिक सौर ऊर्जा जल-उठान  प्रणाली को स्थापित करने की भी योजना बनाई गई। तदनुसार, स्टॉप बांध के पास एक समुदायिक  सौर लिफ्ट सिंचाई-प्रणाली निर्मित की गई। संग्रहीत पानी को सौर ऊर्जा संचालित सबमर्सिबल पंप के माध्यम से उठाया जाता है क्योंकि इस इलाके में बिजली उपलब्ध नहीं थी। यह प्रणाली फ्लोटिंग सबमर्सिबल पंप को चलाने के लिए स्‍थापित 40 सौर पैनलों (250 वाट के एक पैनल) के माध्यम से 10000 वाट बिजली उत्पन्न करती है। 10 हॉर्सपॉवर (एचपी) वाले सबमर्सिबल फ्लोटिंग पंप की पानी को खींचने की क्षमता लगभग 50,000 लीटर/घंटा है। इसके साथ-साथ, 62 आदिवासी परिवारों को सम्मिलित करते हुए 26 हेक्टेयर भूमि में पाइपलाइन बिछाई गई थी, जिसमें प्रत्येक 4 एकड़ जमीन पर एक निकास (आउटलेट) रखा गया था, ताकि आने जाने और पानी देने में होने वाले नुकसान को न्‍यूनतम किया जा सके।  रबी मौसम में सब्जी की खेती के लिए लगभग 4.0 हेक्टेयर भूमि में ड्रिप और स्प्रिंक्‍लर सिंचाई का प्रावधान भी किया गया।   

   

सौर ऊर्जा आधारित इस लिफ्ट सिंचाई प्रणाली की स्थापना के बाद, घरेलू जरूरतों और सिंचाई नेटवर्क के लिए इस सुचारू संचालन प्रणाली को आदिवासी जल उपयोगकर्ता किसानों के पंजीकृत समूह को सौंप दिया गया जिन्होंने इसके संचालन और रखरखाव के लिए प्रयोक्‍ता सदस्‍यों से आ‍र्थिक योगदान लेकर एक रिवॉल्विंग फंड बैंक खाता खोला है।  फसल उत्पादन के लिए बेहतर सिंचाई और प्रौद्योगिकियों पर प्रशिक्षण, लिफ्ट सिंचाई प्रणाली के माध्यम से जल उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए प्रयोक्‍ताओं को प्रशिक्षित करने का कार्य भी किया गया।      

ये किसान खरीफ के मौसम में अरहर, मूंग, तिल, बाजरा और रबी मौसम में गेहूं, सरसों, चना और सब्जी की फसल उगाते हैं और गर्मी में मूंग की फसल लेते हैं। इस सौर सिंचाई प्रणाली की स्थापना से पूर्व मूंग, तिल, बाजरा का क्षेत्र केवल 19.5  हेक्‍टेयर था, जबकि बारानी खेती होने के कारण 5.0 हेक्‍टेयर सीमित क्षेत्रफल में ही गेहूं, सरसों, चना को उगाया जा सका था। सौर सिंचाई प्रणाली के प्रभाव से पहले उगाई जाने वाली फसलों की तुलना में खरीफ फसलों जैसे कि मूंग, तिल, बाजरा में 39 से 92% और गेहूं, सरसों, चना में 10 से 108% तक की वृद्धि पाई गई। सिंचाई देने के पहले खाद्यान्‍न फसलों से प्राप्‍त शुद्ध आय केवल रु. 6165/वर्ष/परिवार थी जबकि उन्‍नत फसल तीव्रता और उत्पादकता के साथ यह रू. 32,440/वर्ष/परिवार तक हो गई। इस ग्रुप के 62 परिवारों की संपूर्ण शुद्ध आय इन हस्‍तक्षेपों (इंटरवेंशन) से पूर्व रु. 3,82,265/वर्ष थी जो इस प्रणाली की संस्‍थापना के बाद कृषि फसलों की खेती से बढ़कर रू0 20,11,329/वर्ष हो गई। इसी प्रकार, प्रणाली के संस्‍थापन से पूर्व फसल का संपूर्ण लाभ:लागत अनुपात 1.8 था जो प्रणाली के संस्‍थापन के बाद 2.9 हो गया और इसी प्रकार फसल सघनता में भी क्रमशः 101 से 205% तक वृद्धि पाई गई। सौर सिंचाई प्रणाली के संस्‍थापन के पश्‍चात  प्रति वर्ष 2248 मानव-दिवसों का रोज़गार सृजन हुआ जबकि सौर प्रणाली के संस्‍थापन पूर्व कृषि फसलों से यह 1161 मानव-दिवस/वर्ष था जिसके फलस्वरूप श्रमिकों के आसपास के शहरों में पलायन में कमी आई। समुदाय आधारित सौर लिफ्ट प्रणाली अन्‍य लाभों में पर्यावरण हितैषी, सिंचाई के स्‍वच्‍छ और हरित विकल्‍प, ईंधन पर शून्‍य व्यय और रखरखाव की कम लागत है। विद्युत मोटर और डीजल इंजन की तुलना में इसमें होने वाला नियमित व्यय (वर्किंग एक्‍सपेंडिचर) तुलनात्मक रूप से कम है। इस प्रणाली से ऊर्जा, समय और श्रम की बचत होती है। इस प्रकार जनजातीय समुदाय अधिक आय सृजित करने और विविधतापूर्ण कृषि उत्पादन द्वारा अपने जीवन स्तर को बढ़ाने में सक्षम होंगे। लिफ्ट सिंचाई प्रणाली का गरीब आदिवासी किसानों पर उल्‍लेखनीय प्रभाव पड़ा है और यह उनके लिए वरदान साबित हुआ है।

(स्रोत: आईसीएआर-एआईसीआरपी-सिंचाई जल प्रबंधन, मोरेन, मध्य प्रदेश)