कृषि विज्ञान केंद्र ने कारगिल की जांस्कर घाटी में किया ऊर्जा नवाचारों का प्रसार

स्थिति विश्लेषण

जांस्कर दुनिया के सबसे ठंडे व शुष्क इलाकों में से एक है, जो समुद्र तल से 3500 मीटर से 6478 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह क्षेत्र -30 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच कश्मीर क्षेत्र के सबसे छोटे और दूरस्थ भागों में से एक है।

निष्ठुर सर्दियों में खाद्य पदार्थों को पकाने, पानी उबालने और जगह को गर्म करके आराम से रहने के लिए ग्रामीण घरों में जानवरों के गोबर ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों में से एक है। महिलाओं को चरागाह भूमि और पशुधन शेड से गोबर इकट्ठा करने और सर्दियों के मौसम के दौरान उपयोग किए जाने वाले गोबर को संग्रहीत करने के लिए जगह-जगह भटकना पड़ता है। दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों के दौरान, जब तापमान तेजी से -30 डिग्री सेल्सियस तक घटने और जमने लगता है, जिससे रसोई गैस और बिजली बेकार हो जाती है, तो गोबर के उपले ठंडी लहरों से निवासियों को राहत दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

KVK spreading Energy Innovations in Zanskar Valley of Kargil  KVK spreading Energy Innovations in Zanskar Valley of Kargil

योजना, कार्यान्वयन और परीक्षण

लगभग 300 दिनों के लिए इस क्षेत्र में काफी तीव्र और स्पष्ट धूप होती है जो समुदाय की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा के प्रमुख स्रोत में से एक हो सकती है। हालाँकि सरकार ने गाँवों में बिजली प्रदान करने के लिए सौर स्टेशन स्थापित किए हैं लेकिन यह आपूर्ति मुख्य रूप से प्रकाश व्यवस्था के लिए है। खाना पकाने, जगह और पानी के गर्म करने जैसी अन्य जरूरतों को पूरी तरह से पशु के गोबर के माध्यम से पूरा किया जाता है।

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संपन्न परिवारों द्वारा निकासी ट्यूब मॉडल के सौर जल तापन प्रणाली स्थापित किए गए हैं, लेकिन सफल नहीं हैं क्योंकि सर्दियों में ट्यूब क्रैकिंग काफी आम है और उसका मरम्मत मुश्किल होता है। घरों में गोबर के जलने से बहुत धुआँ पैदा होता है और रहने की जगह में रिसाव लंबे समय में मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसके अलावा, खाद के गोबर से कृषि योग्य भूमि का जलना इस प्रकार मिट्टी की उर्वरता को कम करता है।

SKUSAT (स्कुसैट), कश्मीर, कृषि विज्ञान केंद्र के बैकस्टॉपिंग की मदद से, जांस्कर ने पानी और जगह को गर्म रखने हेतु स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री द्वारा प्रगतिशील प्रणालियों (पैनलों) के डिजाइन के प्रयास किए जो लद्दाख क्षेत्र के जांस्कर घाटी के आदिवासी समुदाय के लिए उपयुक्त हैं। ये सौर प्रणाली (पैनल) स्थानीय घरों में उपलब्ध लकड़ी के फ्रेम पर गढ़े जाते हैं।

इसमें प्रयुक्त की जानेवाली अन्य सामग्री के रूप में जस्ती लोहा (जीआई) शीट/चादर को अवशोषक और दो छोरों पर पानी के लिए इनलेट और आउटलेट कनेक्शन के साथ जस्ती लोहा (जीआई) पाइप/एल्यूमीनियम मिश्र धातु के कॉइल (तार) (3.75-4.0 सेमी आंतरिक व्यास) हैं। अवशोषक जीआई शीट लकड़ी के फ्रेम के केंद्र में रखी जाती है।

अवशोषक शीट के पीछे (3.75 सेमी) का विद्युत-रोधित थर्मोकोल शीट बिटुमेन से चिपकाया जाता है और सुरक्षा के लिए पतली एल्यूमीनियम शीट के साथ बाहरी तरफ से कवर किया जाता है। अवशोषक शीट के सामने प्रकाशयुक्त भाग को जीआई या रिड्यूसर (2.5 सेमी) एल्यूमीनियम पानी के कॉइल (तार) के साथ स्थायी किया जाता है और ठंडे और गर्म पानी के कनेक्शन के लिए लकड़ी के फ्रेम के माध्यम से पानी के इनलेट और आउटलेट को फैलाया जाता है। अवशोषक शीट और एल्यूमीनियम पानी का कॉइल (तार) काले रंग के साथ रंगा होता है जिसमें स्थानीय तौर पर विशिष्ट लकड़ी से उत्पादित बेहतर कार्बन पाउडर होता है जो सौर ऊर्जा अवशोषण की दक्षता में वृद्धि करता है। हवा को थामे रखने और ताप के अवरोधन के लिए कॉइल (तार) पैनल के शीर्ष पर इसे 1.25 सेमी की दूरी वाले विंडो ग्लास (4 मिमी) की दो परतों के साथ कवर किया गया है। अधिकतम धूप को पकड़ने के लिए दक्षिण की ओर छत के शीर्ष पर 45 डिग्री के कोण में पैनल स्थापित किया गया है।

पैनल का कॉइल (तार) 18.0 लीटर पानी थामे रखता है और सौर रोशनी के 30-45 मिनट के भीतर 70-80 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होता है। घर के सदस्य घरेलू प्रयोजन हेतु साफ धूप वाले दिन में पानी गर्म करने के लिए आग जलाने की जगह के बिना 100-120 लीटर गर्म पानी खींच सकते हैं। ये स्थितियाँ इस प्रणाली की दक्षता को बढ़ावा देती हैं और एल्यूमीनियम ट्यूब कॉइल (तार) के साथ जीआई पाइप कॉइल (तार) डिजाइन के प्रतिस्थापन और गर्म पानी की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ पीने योग्य बनाती है। इसे खाना पकाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सर्दियों के दौरान जब पाइप से पानी की आपूर्ति नहीं होती है तब बेहतर दक्षता व हाथ से भरने के लिए ठंडे पानी के इनलेट के साथ हिमनिरोधी (एंटीफ्रीज) और गाद (सिल्ट) जल निकासी आउटलेट फिट किया गया था।

सौर स्थान तापन प्रणाली (सोलर स्पेस हीटींग पैनल) बिना पानी के कॉइल (तार) के सौर जल तापन पैनल के समान है। बैठक कक्ष के दक्षिण की ओर की दीवार पर पैनल को स्थायी किया गया है, जिसके निचले और ऊपरी सिरे पर हवा है। जब पैनल के काले अवशोषक शीट को ग्लेजिंग (काँच की तह) के माध्यम से सूर्य की किरणों से गर्म किया जाता है तब ग्लेज़िंग और अवशोषक शीट के बीच की हवा गर्म होती है और बैठक कक्ष की तरफ ऊपर जाती है। ग्लेज़िंग और अवशोषक स्थान के बीच वैक्यूम (शून्य स्थान) बनाया गया है और ठंडी हवा कमरे से यहाँ प्रवेश करती है। इस तरह से एयर साइफन (हवा को गर्म रखने का एक यंत्र) बनाया जाता है और कमरे की हवा को ऊर्जा के किसी भी सक्रिय उपयोग के बिना एक आरामदायक स्तर तक गरम किया जाता है। इसलिए इस पैनल को थर्मोसाइफन एयर हीटिंग पैनल (टीएपी) भी कहा जाता है। इस तकनीक के परीक्षण से पता चला है कि कम लागत वाले सौर पैनलों ने 35 मिनट में 120 लीटर ठंडे पानी (11 डिग्री सेल्सियस) को उबला हुआ पानी (84 डिग्री सेल्सियस) में गर्म कर दिया। गर्म पानी और गर्म स्थान की उपलब्धता के कारण नियमित रूप से स्नान और कपड़े धोने के परिणामस्वरूप आदिवासियों के घर के अंदर प्रदूषण और स्वच्छता में कमी आएगी। इससे आदिवासी महिलाओं के कीमती समय को खेत से गोबर इकट्ठा करने में भी बचाया जा सकेगा।

स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से बने होने के कारण, ये नवीन सौर पैनल किफायती हैं। इसके साथ ही, पैनलों को लगाने के बाद कम-से-कम रख-रखाव की आवश्यकता होती है और कारीगर (बढ़ई) द्वारा इसे निर्मित किया जाना आसान होता है। इस दिशा में, कृषि विज्ञान केंद्र ने गाँवों में निर्माण और स्थापना के लिए स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षित किया।

प्रभाव

प्रौद्योगिकी के सकारात्मक परिणामों के मद्देनजर, कृषि विज्ञान केंद्र, जांस्कर ने घाटी में कुछ स्थानों पर इस परियोजना को सफलतापूर्वक चलाया और पाया कि प्रौद्योगिकी के अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। नियत समय में, प्रौद्योगिकी को आदिवासियों द्वारा सफलतापूर्वक अपनाया गया है। क्षेत्र में आदिवासी समुदाय से अनुकूल प्रतिक्रिया, समानता सशक्तिकरण और विकास प्रभाग विज्ञान (SEED), विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार से प्राप्त धन की मदद से लगभग 158 घरों में इन नवीन कम लागत वाले सौर हीटरों की स्थापना का नेतृत्व किया गया।

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प्रौद्योगिकी के लाभ और व्यावहारिक उपयोगिता ने जिला कारगिल के लद्दाख विकास परिषद (एलडीसी) को बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी को अपनाने और दोहराने के लिए प्रेरित किया। नतीजतन, अब कृषि विज्ञान केंद्र, जांस्कर न केवल जांस्कर घाटी के अन्य हिस्सों में, बल्कि कश्मीर के अल्पाइन क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी इस सौर जल और स्थान तापन तकनीक के डिजाइन और विकास को प्रदर्शित करने के लिए तैयार है।

(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, लुधियाना)