केवीके, भाकृअनुप-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली द्वारा प्राकृतिक खेती हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

23  जुलाई, 2022, इज्जतनगर, बरेली

कृषि विज्ञान केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली द्वारा 23 जुलाई, 2022 को, ग्राम हमीरपुर में भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति के अन्तर्गत एक दिवसीय गौ आधारित प्राकृतिक खेती विषय पर प्रशिक्षण व विधि प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में, गौ आधारित प्राकृतिक खेती से होने वाले लाभों तथा इसके प्रयोग से संबंधित सावधानियों पर चर्चा की गई।

 

इस अवसर पर, डॉ. बृजपाल सिंह, अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केन्द्र, बरेली ने किसानों को जैविक व प्राकृतिक खेती के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी तथा बताया की प्राकृतिक खेती को न्यूनतम लागत पर किया जा सकता है तथा किसानों को इसे छोटे स्तर पर अपनाने की सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि यह स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए सर्वोत्तम है।

 

श्री राकेश पांडे, विषय वस्तु विशेषज्ञ (सस्य विज्ञान ) ने कहा कि प्राकृतिक खेती बाजार पर किसान की निर्भरता को कम करके आत्मनिर्भर खेती की तरफ ले जाएगा। उन्होने इसमें उपयोग होने वाले गौ आधारित उत्पादों, जीवामृत आदि बनाने के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी दी। श्री पांडे ने इनके उपयोग के विभिन्न स्तर के बारे में बताया, पलेवा के समय तथा खड़ी फसल में जीवामृत, घनजीवामृत, पंचगव्य; फसल पोषण हेतु सप्त धान्यांकुर; बीज उपचार हेतु बीजामृत; रोगो व कीटों से बचाने हेतु अग्नि अस्त्र, ब्रम्हास्त्र, नीमास्त्र, दशपर्णी अर्क के उपयोग किये जाते है। प्राकृतिक खेती को अपनाने का उद्देश्य मृदा में रहने वाले जीवाणुओं को सशक्त करना है, जो मिट्टी से पोषक तत्वो को पौधो को उपलब्ध कराती है। उन्होंने कहा आज आधुनिक तकनीकों व रसायनो से युक्त खेती से जीवाणुओं की संख्या बहुत ही कम हो गयी है जिसे प्राकृतिक खेती द्वारा फिर से संरक्षित करने का एक पहल है।

श्री राकेश पांडे, विषय वस्तु विशेषज्ञ (सस्य विज्ञान) एवं श्रीमति वाणी यादव, मृदा विज्ञान विशेषज्ञ की देखरेख में गाँव के ही, गौ आधारित प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर कृषक, श्री ओम प्रकाश ने कृषको को जीवामृत बनाने की विधि प्रदर्शन के द्वारा समझाया। इसमें उन्होंने, 10 किलो देसी गाय का गोबर, 10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र, 1 किलो बेसन, 1 किलो गुड व एक मुट्ठी नीम व बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी प्रयोग करके 200 लीटर जीवामृत तैयार किया। श्री प्रकाश ने बताया की यह जीवामृत 2-3 दिन बाद एक एकड़ खेत में उपयोग करने के लिये तैयार हो जायेगा।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 48 कृषक तथा कृषक महिलाओं ने भागीदारी की।

(स्रोतः केवीके, भाकृअनुप-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली)